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पण्डित लोकनाथ शास्त्री के "तर्क वाचस्पति" बनने की घटना


आर्यसमाज द्वारा अछूतोद्धार पर वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ का विलाप
और
पण्डित लोकनाथ शास्त्री के "तर्क वाचस्पति" बनने की घटना

-प्रियांशु सेठ

आर्यसमाज के दिग्गज शास्त्रार्थी व आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब के महोपदेशक के रूप में रहे पण्डित लोकनाथ जी शास्त्री के नाम से शायद ही कोई स्वाध्यायशील आर्यसमाजी अपरिचित हो। भारत के प्रथम अन्तरिक्ष यात्री के रूप में प्रसिद्ध श्री राकेश शर्मा जी के आप दादा जी थे। घटना ऐसी है कि वर्ष 1933 में अखिल भारतवर्षीय वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ के स्वयंसेवक काशी की गलियों में घूम-घूम कर अछूतोद्धार के ख़िलाफ़ प्रचार और अछूतों के मन्दिर-प्रवेश के विरुद्ध जनता में ज़हरीली उल्टियाँ करते थे तो आर्यसमाज काशी ने इन्हें "स्पृश्यास्पृश्य" विषय पर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा और खुला चैलेंज छपवाकर सारे शहर में बंटवा दिया। लेकिन आर्यसमाजियों से शास्त्रार्थ करने की हिम्मत ही किसमें थी; अतएव लम्बा पत्र-व्यवहार हुआ लेकिन वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ वाले टालमटोल करने से बाज़ नहीं आए। उन्होंने बहाना दिया कि "शास्त्रार्थ संस्कृत में लेखबद्ध होगा।" आम जनता की सम्मति और रुचि को देखते हुए आर्यसमाज की तरफ़ से उत्तर जारी किया गया कि "शास्त्रार्थ में प्रमाण संस्कृत में पेश किये जाएं और शास्त्रार्थ आर्यभाषा (हिन्दी) में मौखिक रूप से हो, जिससे जन साधारण को भी लाभ पहुंचे। यदि संस्कृत में ही शास्त्रार्थ करने का घमण्ड है तो शास्त्रार्थ पण्डित सभा में हो जावे, आर्यसमाज इसे भी स्वीकार करता है।" परन्तु वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ जनता को अंधेरे में रखकर अपनी मनमानी करना चाहता था। आर्यसमाज के बार-बार पत्र लिखने, नोटिस निकालने पर और पण्डित लोकनाथ जी शास्त्री के बार-बार ललकारने पर कि शास्त्रार्थ जिस विषय में चाहे करिये और संस्कृत में करना हो तो पण्डित सभा की आयोजना कीजिए- सबकुछ करने पर भी वर्णाश्रमियों ने कुछ न मानी और मनमाने तौर पर जनता में भ्रम फैलाने के लिए नोटिस निकाल दिया कि शास्त्रार्थ 5 जनवरी को 9 बजे से 12 बजे तक होगा। 5 जनवरी को प्रातःकाल ही वर्णाश्रमियों ने अपने पण्डाल में 1 मेज़ और 1 कुर्सी आर्यसमाजियों के लिए रख दी और अपवाद फैलाने लगे कि "देखना, आर्यसमाजी शास्त्रार्थ के लिए नहीं आएंगे।" जब आर्यसमाजियों को उनकी इस चालबाज़ी का पता लगा तो आर्यसमाज काशी ने अपने दो आदमियों को भेजा कि शास्त्रार्थ के सम्बन्ध में नियमों की स्वीकृति लेकर आओ। परन्तु वर्णाश्रमियों ने स्वीकृति देने के स्थान पर लाठी द्वारा अपने हिंसक संस्कारों का प्रदर्शन किया तथा जनता के रोकने पर कि यह उचित नहीं है, जनसाधारण पर भी लाठी का प्रयोग किया। बहुत से लोगों को चोट आई जो सिर्फ शास्त्रार्थ सुनने गए थे व जिनका आर्यसमाज से कोई भी सम्बन्ध नहीं था।

वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ के इस कुकृत्य की पूरे काशी नगर में चर्चा हुई। आबाल-वृद्ध सबने वर्णाश्रमियों को धिक्कारा। काशी के तारीख़ 6,7,8 जनवरी 1933 के राष्ट्रीय समाचार पत्र "आज" में उनके इस असभ्यतापूर्ण व्यवहार के सम्बन्ध में कई लेख प्रकाशित हुए। उन लेखों के शब्द थे- "आर्यसमाजी लाठी शास्त्रार्थ में हार कर चले गए इत्यादि।" यहां उल्लेखनीय है कि वर्णाश्रमियों के 1 से 5 जनवरी 1933 के हुए उत्सव में महर्षि दयानन्द, महात्मा गांधी, पं० मदनमोहन मालवीय आदि को दिल खोलकर गालियां दी गई थी। इधर आर्यसमाज मन्दिर काशी में लगातार स्पृश्यास्पृश्य विषय पर पण्डित लोकनाथ शास्त्री जी के भाषण हुए और प्रत्येक व्याख्यान में आर्यसमाज के किसी भी सिद्धान्त के विषय में पौराणिकों को ललकारा गया परन्तु किसी में भी पण्डित जी के सामने आने की हिम्मत न हुई। चूंकि आर्यसमाज काशी में उपस्थिति इतनी हो गई कि बहुतों को बैठने की जगह न मिलने से निराश होकर लौटना पड़ा। इसपर उक्त श्री पण्डित लोकनाथ शास्त्री जी के दो व्याख्यान टाउनहॉल के मैदान में कराए गए जहां जनता ने बड़ी संख्या में आकर व्याख्यान का लाभ उठाया। इन्हीं दिनों काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान् श्री गोस्वामी दामोदरलाल जी शास्त्री ने महोपदेशक पण्डित लोकनाथ जी शास्त्री को "तर्क वाचस्पति" की उपाधि से विभूषित किया।

[संलग्न चित्र काशी के टाउनहॉल मैदान का है जहां सन् 1933 में पण्डित लोकनाथ शास्त्री जी के दो व्याख्यान हुए थे।]

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