Skip to main content

हम सब ऋणी


हम सब ऋणी

-डॉ० राजेन्द्रप्रसाद [भारत के प्रथम राष्ट्रपति]

स्वामी दयानन्द की सबसे बड़ी विशेषता उनकी दूरदर्शिता थी। यह देखकर आश्चर्य होता है कि विदेशी शासन के विरोध में सक्रिय संघर्ष के समय जिन बातों पर महात्मा गांधी ने अधिक बल दिया और उन्हें रचनात्मक कार्य की संज्ञा दी, प्रायः वे सभी काम स्वामी दयानन्द के कार्यक्रम में ५० वर्ष पूर्व शामिल थे।

देश भर के लिए एक सामान्य भाषा की आवश्यकता स्वामी दयानन्द ने महसूस की और हिन्दी को ही राष्ट्र अथवा आर्य भाषा होने के योग्य माना।
इसके अतिरिक्त अछूतोद्धार, स्त्री शिक्षा, हाथ के बने कपड़े अथवा स्वदेशी का प्रयोग इत्यादि बातों पर भी उन्होंने काफी बल दिया और वे स्वयं भी जीवन भर इन बातों पर पूरा अमल करते रहे।

उनकी कृतियों और उपदेशों से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि वे विचारों से राष्ट्रवादी थे और विदेशी शासन के स्थान पर स्वराज्य अथवा भारतीयों के ही राज्य का स्वप्न देखते थे।

समाज सेवा के क्षेत्र में स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज ने जो कार्य किया उसके महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। उस कार्य के लिए और देश को जो उससे लाभ पहुंचा उसके लिए हम सब स्वामी दयानन्द के ऋणी हैं।

[स्त्रोत- 'सार्वदेशिक' (साप्ताहिक) : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली का मुख पत्र का ३० अगस्त - ६ सितम्बर, १९६६ का वेद कथा विशेषांक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Comments

Popular posts from this blog

मनुर्भव अर्थात् मनुष्य बनो!

मनुर्भव अर्थात् मनुष्य बनो! वर्तमान समय में मनुष्यों ने भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय अपनी मूर्खता से बना लिए हैं एवं इसी आधार पर कल्पित धर्म-ग्रन्थ भी बन रहे हैं जो केवल इनके अपने-अपने धर्म-ग्रन्थ के अनुसार आचरण करने का आदेश दे रहा है। जैसे- ईसाई समाज का सदा से ही उद्देश्य रहा है कि सभी को "ईसाई बनाओ" क्योंकि ये इनका ग्रन्थ बाइबिल कहता है। कुरान के अनुसार केवल "मुस्लिम बनाओ"। कोई मिशनरियां चलाकर धर्म परिवर्तन कर रहा है तो कोई बलपूर्वक दबाव डालकर धर्म परिवर्तन हेतु विवश कर रहा है। इसी प्रकार प्रत्येक सम्प्रदाय साधारण व्यक्तियों को अपने धर्म में मिला रहे हैं। सभी धर्म हमें स्वयं में शामिल तो कर ले रहे हैं और विभिन्न धर्मों का अनुयायी आदि तो बना दे रहे हैं लेकिन मनुष्य बनना इनमें से कोई नहीं सिखाता। एक उदाहरण लीजिए! एक भेड़िया एक भेड़ को उठाकर ले जा रहा था कि तभी एक व्यक्ति ने उसे देख लिया। भेड़ तेजी से चिल्ला रहा था कि उस व्यक्ति को उस भेड़ को देखकर दया आ गयी और दया करके उसको भेड़िये के चंगुल से छुड़ा लिया और अपने घर ले आया। रात के समय उस व्यक्ति ने छुरी तेज की और उस...

वेदों में ईश्वर के एक होने के प्रमाण

वेदों में ईश्वर के एक होने के प्रमाण लेखक -  पंडित धर्मदेव विद्यामार्तण्ड वेदों में ईश्वर के एक होने (Monotheism) का वर्णन है जबकि पश्चिमी विद्वानों द्वारा वेदों में अनेक ईश्वर (Polytheism) होना बताया गया है । स्वामी दयानंद द्वारा वेद विषयक वैचारिक क्रान्ति का मैक्समूलर पर इतना प्रभाव हुआ कि कालान्तर में मैक्समूलर भी वेदों में एकेश्वरवाद की धारणा का समर्थन करने पर विवश हो गये । इस सन्दर्भ में वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् पण्डित धर्मदेव विद्यामार्तण्ड जी द्वारा लिखित यह अलभ्य लेख " वैदिक ईश्वरवाद " हमारी शंका का समाधान करने के साथ - साथ अत्यन्त रोचक और विचारणीय है । ( १ ) कई विद्वान ' वेद असभ्य जंगली लोगों द्वारा बनाये गये और उनमें इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के लिये अग्नि , वायु , सूर्य , नदी , समुद्र , पर्वत आदि की पूजा का इन्द्र , मित्र , वरुण , मरुत आदि देवों के नाम से उपदेश है ' ऐसा बताते हैं । ( २ ) अन्य कई विद्वान् वे...

असत्य-पराजय

असत्य-पराजय अर्थात् वामपंथी मौलाना अहसन फिरोजाबादी के 'हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ रामायण की असल हकीकत' नामक अश्लील और उच्छृंखलतापूर्ण लेख का मुंहतोड़ जवाब लेखक- प्रियांशु सेठ प्राचीनकाल के ऋषि हमें वेद के उपदेश 'पापीरप वेशया धिय: (अथर्व० ९/२/२५)' पर चलने की प्रेरणा देते हैं। मन्त्र का भाव है कि 'हे प्रभो! पापमय बुद्धियों को- विचारों को अन्यत्र हमसे दूर अन्य स्थानों पर ही रखिये।' वेद का सन्देश है कि मानव को न अपने कर्म से अपितु अपने विचारों से भी पाप-वासना को दूर रखना चाहिए, यथा- 'हे मेरे मन के पाप! मुझसे बुरी बातें क्यों करते हो? दूर हटो, मैं तुझे नहीं चाहता (अथर्व० ६/४५/१)।' वेद के इस महान् सन्देश को ऋषियों ने अपने जीवन का अंग बनाया। ऋषियों की दृष्टि में धन-नाश कोई हानि नहीं, स्वास्थ्य-नाश एक बड़ी हानि है और चरित्र-नाश सर्वनाश है। आदिकवि 'महर्षि वाल्मीकि' भी इन ऋषियों में से ही थे। वाल्मीकि जैसे प्रतिभा-सम्पन्न, धर्मज्ञ, सत्य-प्रतिज्ञ और उच्च विचारों वाला कवि आज तक नहीं हुआ। उनका आदिकाव्य 'श्रीमद्वाल्मीकी-रामायण' भूतल का प्रथम ऐति...