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चित्ति, उक्ति, कृति की एकता



चित्ति, उक्ति, कृति की एकता

लेखक- स्वामी वेदानन्द (दयानन्द) तीर्थ

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते। -ऋ० १०/१९१/२

शब्दार्थ- यथा= जैसे पूर्वे= पूर्ववर्त्ती अथवा पूर्ण देवा:= विद्वान् सं+जानाना= भली प्रकार जानते हुए भागम्= सेवन करने योग्य मोक्ष, प्रभु की उपासते= उपासना करते हैं, वैसे ही तुम सब सं+ गच्छध्वम्= एक-सा चलो, सं वदध्वम्= एक-सा बोलो। व:+जानताम्= तुम ज्ञानियों के मनांसि= मन सम्= एक-समान हों।

व्याख्या- ऋग्वेद [१०/१९१/१] में भगवान् से प्रार्थना की गई है कि प्रभो! हमें धन दो। भगवान् ने तीन मन्त्रों में धन-साधन का उपदेश दिया है। उन तीनों में से यह पहला मन्त्र है। भगवान् का आदेश है-

१. सं गच्छध्वम्= तुम सब एक-सा चलो, अथवा एक-साथ चलो। किसी कार्य की सिद्धि के लिए कार्य करने वालों की चाल, गति भिन्न-भिन्न होगी, तो कार्यसिद्धि में बड़ी बाधा आ खड़ी होगी, अतः सभी की गति, कृति, आचार एक-सा होना चाहिए।

२. वदध्वम्= तुम सब एक-सा बोलो। चाल की समानता के लिए बोल की समानता अत्यन्त आवश्यक है। बोली= भाषा के भेद के कारण बहुधा विचित्र किन्तु निरर्थक झगड़े हुए हैं। एकता स्थापित करने के लिए एक भाषा का होना अत्यन्त आवश्यक है। एक भाषाभाषी एक गुट बना लेते हैं, प्रायः उनका दूसरी भाषा बोलने वालों से सम्पर्क न्यून ही रहता है, फलतः उनसे उचित सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता, अतः मनुष्यों की बोली, भाषा, उक्ति, उच्चार एक-सा होना चाहिए।

३. सं वो मनांसि जानताम्= तुम ज्ञानियों के मन एक-समान हों। एक-जैसा बोल तभी हो सकता है, जब मनों के भाव एक-से हों, अर्थात् जब तक मनुष्यों का ज्ञान, विचार एक-सा न हो, तब तक उच्चार और आचार की एकता असम्भव है। उच्चार और आचार का मूल विचार है, क्योंकि जो कुछ मन में होता है, वही वाणी पर आता है और जो वाणी से बोला जाता है, वहीं कर्म में परिणत होता है। पूर्ण विद्वान् सदा ही एक-सा व्यवहार करता हैं। अथर्ववेद [६/६४/१] में भी इसी प्रकार का मन्त्र है। उसके पूर्वार्द्ध में थोड़ा-सा भेद है। उसे यहां उद्धृत करते हैं- 'सं जानीध्वं सं पृच्यध्वं सं वो मनांसि जानताम्'- एक-सा चलो, एक-साथ मिलो। तुम सब ज्ञानियों के मन एक-समान हों।

ऋग्वेद में 'संवदध्वम्' है, अथर्ववेद में 'संपृच्यध्वम्' है। इस एक शब्द के भेद ने बहुत ही चमत्कार किया है। ज्ञानीजन यह कहते हैं कि अपने ज्ञान द्वारा विचार में समानता उत्पन्न करके उच्चारों, आचारों में समानता ला दें, किन्तु अज्ञानियों के विचारों में एकता नहीं हो सकती। अथर्ववेद के मन्त्र में उसी का साधन बताया है- तुम सब इकठ्ठे चलो, और एक-दूसरे के साथ मिल जाओ, तब ज्ञानियों के समान तुम्हारे विचार भी एक-से हो जाएंगे। ऋग्वेद में साध्य से पहले कहा है। अथर्ववेद में उन्हीं शब्दों द्वारा, केवल एक शब्द का भेद करके, साधन-सिद्धि का उपाय बतला दिया है।

[स्वाध्याय संदोह से साभार]

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