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सत्यार्थप्रकाश पर नियोग का मिथ्या दोषारोपण

सत्यार्थप्रकाश पर नियोग का मिथ्या दोषारोपण प्रियांशु सेठ गुरुडम, पाखण्ड, अन्धविश्वास आदि के सागर में डूबते हुए हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने वाले, वेद-वेदाङ्गों के प्रकाण्ड विद्वान्, समाज-सुधारक एवं आर्यसमाज के प्रवर्त्तक, सत्यान्वेषी महर्षि दयानंद जी एवं उनके पुस्तक सत्यार्थप्रकाश का मनुष्यजाति हेतु योगदान अवर्णनीय एवं अविस्मरणीय है। यद्यपि आजकल बहुत से विद्वान् लोग विभिन्न मतों में हैं, जो पक्षपाती होकर वैदिक धर्म एवं सत्यार्थप्रकाश की निंदा करने में लगे रहते हैं। जिन्होंने भी सत्यार्थप्रकाश पर आक्षेप किया है, सबसे पहला आक्षेप नियोग विषय को लेकर ही किया है। परन्तु 'सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:' अर्थात् सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य से ही विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है। इस लेख में नियोग विषय पर लगे प्रत्येक आक्षेपों का जवाब क्रमबद्ध दिया जायेगा। नियोग: नियोग उसको कहते हैं जिस से विधवा स्त्री और जिस पुरुष की स्त्री मर गई हो वह पुरुष, ये दोनों परस्पर नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करते हैं। प्रश्न- नियोग में क्या-क्या...

क्या वास्तव में वेदों में मूर्तिपूजा है?

क्या वास्तव में वेदों में मूर्तिपूजा है? कीथ आदि पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार निम्न मन्त्र में पत्थर की मूर्ति बैठे हुए देवता का वर्णन है- ऋषीणां प्रस्तरोअसि नमोअस्तु दैवाय प्रस्तराय। -अथर्व० १६-२-६ ऋग्वेदीय निम्नलिखित मन्त्र में भी मूर्तिपूजा का स्पष्ट वर्णन है- क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभि:। -ऋ० ४-२४-१० अर्थात् मेरे इन्द्र को दश गौओं के बदले कौन खरीदेगा? इस प्रकार का इन्द्र पत्थर मूर्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकता। आइए, हम इन मन्त्रों के वास्तविक अर्थों को देखें। अथर्ववेदीय मन्त्र में 'प्रस्तर' का अर्थ है आसन। ग्रिफिथ महोदय ने भी इसका अर्थ Couch आसन ही किया है। यहां आसन से तात्पर्य शरण और आश्रय से है। इस प्रकार मन्त्र का भाव होगा- हे परमात्मन्! आप मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के आश्रय हैं, समस्त संसार के आश्रय दिव्यस्वरूप आपको नमस्कार हो। इस प्रकार मन्त्र में मूर्तिपूजा की गन्ध भी नहीं है। प्रस्तर का अर्थ पत्थर की मूर्ति वेद की किसी भी अन्तः साक्षी से सिद्ध नहीं होता। अब ऋग्वेदीय मन्त्र को लीजिए। वैदिक साहित्य में इन्द्र का अर्थ है परमात्मा, आत...

महात्मा बुद्ध पर मांसाहार का मिथ्या दोषारोपण : एक जटिल समस्या

महात्मा बुद्ध पर मांसाहार का मिथ्या दोषारोपण : एक जटिल समस्या लेखक- शास्त्रार्थ महारथी डॉ० शिवपूजनसिंह कुशवाहा जी प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ सहयोगी- वैदिक विद्वान् डॉ० ब्रजेश गौतम जी तथागत (महात्माबुद्ध) का जन्म कपिलवस्तु नगर में सूर्यवंशान्तर्गत शाक्यवंश में हुआ था। सुमंगलविलासिनी और 'महावंश' की कथाओं में शाक्यों का राजा इक्ष्वाकु का वंशज बताया गया है। 'विष्णुपुराण' से भी इसी मत की पुष्टि होती है। 'महावस्तु' में शाक्यों को आदित्यबन्धु कहा गया है। आदित्यबन्धु और सूर्यवंशी एक ही बात है। सम्प्रति शाक्यवंश के प्रतिनिधि 'शाक्यसेनी मुराव' हैं। महात्मा बुद्ध की मृत्यु कैसे हुई, इसपर विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार हैं। कहा जाता है कि उन्हें 'सूकर मद्दवम्' खिलाया गया था जो कि सुअर का मांस था। उसे वे पचा न सके। उन्हें अतिसार हो गया और अन्त में उसी रोग से उनका कुशीनगर (वर्तमान कसियाँ जिला देवरिया) में देहावसान हो गया। 'सूकर मद्दवम्' क्या पदार्थ हैं? इसके सम्बन्ध में 'महापरिनिब्वानसूक्त' के भाष्यकारों ने अपने-अपने विभिन्न मत प्रकट किए ह...

मृत्यु पर विजय

मृत्यु पर विजय प्रियांशु सेठ हम सभी को ज्ञात है कि जो इस सृष्टि में जन्म लिया है उसे एक दिन मरना ही होगा । यही सृष्टि का नियम है किन्तु क्या मृत्यु पर भी विजय प्राप्त किया जा सकता है ? यह प्रश्न स्वामी दयानन्द जी की भी आत्मकथा का एक हिस्सा है तो आइए पढ़ें कि किस प्रकार स्वामी जी का उद्देश्य मृत्यु पर विजय प्राप्त करना हो गया था ? भारत की संस्कृति वर्ण - व्यवस्था पर आधारित है । यहां गुणों के आधार पर वितरण होता है । जो जैसा कर्म करता है , वैसा ही वर्ण उसे मिल जाता है । इसी प्रकार यहां आश्रम व्यवस्था भी सृष्टि के आदिकाल से चली आ रही है । 25 साल तक ब्रह्मचारी , फिर 25 से 50 तक गृहस्थी और 50 से 75 तक वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यास आश्रम । ये चारों आश्रम जीवन के आधार हुआ करते थे । लेकिन संन्यास आश्रम के बारे में कहा जाता है कि यह तभी सार्थक है , जब वैराग्य उत्पन्न हो जाए और यदि वैराग्य बचपन या जवानी में भी उत्पन्न हो जाए तो व्यक...