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मानवता को महर्षि मनु की देन

मानवता को महर्षि मनु की देन लेखक- डॉ० सुरेन्द्र कुमार (मनुस्मृति भाष्यकार) प्राचार्य, राजकीय महिला महाविद्यालय, महेन्द्रगढ़ (हरि०) प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ, डॉ विवेक आर्य 'मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र और संविधान के प्रणेता राजर्षि मनु 'स्वायम्भुव' न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की धरोहर हैं। आदिकालीन समाज में मानवता की स्थापना, संस्कृति-सभ्यता का निर्माण और इनके विकास में राजर्षि मनु का उल्लेखनीय योगदान रहा है। यही कारण है कि भारत के विशाल वाङ्मय के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के साहित्य में मनु और मनुवंश का कृतज्ञतापूर्ण स्मरण तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। यह उल्लेख इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्राचीन समाज में मनु और मनुवंश का स्थान महत्वपूर्ण और आदरणीय था। जिस प्रकार विभिन्न कालखण्डों में उत्पन्न विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने तथा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये उनका नाम स्थानों, नगरों आदि के साथ जोड़ दिया जाता है उसी प्रकार प्राचीन समाज ने मनु और मनुवंश का नाम सृष्टि के कालखण्डों के साथ जोड़कर चौदह मन्वन्तरों क...

महर्षि दयानन्द का यज्ञ विषयक् वैज्ञानिक पक्ष

महर्षि दयानन्द का यज्ञ विषयक् वैज्ञानिक पक्ष लेखक- पं० वीरसेन वेदश्रमी प्रस्तोता- डॉ विवेक आर्य, प्रियांशु सेठ यज्ञ में मन्त्रोच्चारण कर्म के साथ आवश्यक है- महर्षि स्वामी दयानन्द जी ने यज्ञ की एक अत्यन्त लघु पद्धति या विधि हमें प्रदान की जो १० मिनट में पूर्ण हो जावे। उसमें मन्त्र के साथ कर्म और आहुति का योग किया। बिना मन्त्र के यज्ञ का कोई कर्म, यज्ञ का अंग नहीं बन सकता। बिना मन्त्र उच्चारण किये किसी भी पदार्थ को अग्नि में जला देने से, वह यज्ञाहुति का स्वरूप प्राप्त नहीं कर सकती और न वह उस महान् लाभ को भी उत्पन्न करने में उतनी समर्थ हो सकती है। इसलिए विधिवत् यज्ञ करने से ही यथोचित लाभ होगा, अन्यथा नहीं। यज्ञ की प्रथम क्रिया और प्रथम मन्त्र का भाव- भगवान् दयानन्द ने प्राणिमात्र पर अपार दया करके यज्ञ की प्रथम क्रिया प्रारम्भ करने के लिए एक छोटा सा मन्त्र दिया। कहा कि इस महान् कार्य के लिये अग्नि प्रदीप्त करना हो तो- ओ३म् भूर्भुवः स्व:- यह छोटा सा मन्त्र बोलकर घृत का दीपक प्रज्वलित कर लेना। क्योंकि यही घृत दीप की मूलाधार प्रारम्भ ज्योति ही व्याप्त रूप में विराट बनकर भू अर...

अहिंसा के संदेशवाहक श्रीरामचन्द्र जी

अहिंसा के संदेशवाहक श्रीरामचन्द्र जी लेखक- प्रियांशु सेठ रामायण के अध्ययन से हमें यह उपदेश मिलता है कि श्रीरामचन्द्र जी वैदिक धर्म के मानने वाले आर्यशील पुरुष थे। बालकाण्ड सर्ग १ श्लोक १२,१३,१५,१६ में श्रीराम जी के यथार्थ गुणों का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'धर्मज्ञ, सत्य प्रतिज्ञा, प्रजा हितरत, यशस्वी, ज्ञान सम्पन्न, शुचि तथा भक्ति तत्पर हैं। शरणागत रक्षक, प्रजापति समान प्रजा पालक, तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ गुणधारक, रिपु विनाशक, सर्व जीवों की रक्षा करने वाले, धर्म के रक्षक, सर्व शास्त्रार्थ के तत्ववेत्ता, स्मृतिमान्, प्रतिभावान् तेजस्वी, सब लोगों के प्रिय, परम साधु, प्रसन्न चित्त, महा पंडित, विद्वानों, विज्ञान वेत्ताओं तथा निर्धनों के रक्षक, विद्वानों की आदर करनेवाले जैसे समुद्र में सब नदियों की पहुंच होती है वैसे ही सज्जनों की वहां पहुंच होती है। परम श्रेष्ठ, हंस मुख, दुःख सुख के सहन कर्ता, प्रिय दर्शन, सर्व गुणयुक्त और सच्चे आर्य पुरूष थे।' अयोध्याकाण्ड सर्ग ३३ श्लोक १२ में भी उनकी महिमा का गायन इस प्रकार है- 'अहिंसा, दया, वेदादि सकल शास्त्रों में अभ्यास, सत्य स्वभाव...

क्या स्त्रियों को भी गायत्री जप का अधिकार है

क्या स्त्रियों को भी गायत्री जप का अधिकार है प्रियांशु सेठ आज के युग में हिन्दू समाज में एक भ्रान्ति फैली हुई है कि गायत्री मन्त्र के जप का अधिकार स्त्रियों को नहीं है। ये हमारे शास्त्रों के विरुद्ध है। प्राचीन काल में सभी स्त्रियां व पुरुष नित्य गायत्री की उपासना करते थे किन्तु आज ये नहीं होता। आजकल पौराणिक गुरु अपने चेले और चेलियों को नए-नए मन्त्र (?) देते हैं। कोई 'रामं रामाय नमः' का, कोई 'नमो नारायण:' बता रहा है तो कोई 'सोअहम्' और न जाने क्या-क्या। इन मन्त्रों में द्वादशाक्षर मन्त्र अत्यन्त प्रसिद्ध है। वह तथाकथित मन्त्र है- 'ओं नमो भगवते वासुदेवाय'। इस मन्त्र के सम्बन्ध में पहली बात तो यह है कि यह मन्त्र ही नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मन्त्र को किसी वेद में नहीं दिखा सकता। दूसरी बात यह कि यह द्विजों के लिए नहीं है। यह बात पुराणों से भी सिद्ध होती है। पुराणों में कहा गया है- द्वादशाक्षरकं मन्त्रं स्त्रीशूद्रेषु विधीयते। -विष्णुधर्मो० प्रथम खण्ड १५५/२८ अर्थात् द्वादश अक्षर का मन्त्र स्त्री और शूद्रों के लिए है। जब स्त्रियों को वेदाधिकार...

सत्यार्थप्रकाश पर नियोग का मिथ्या दोषारोपण

सत्यार्थप्रकाश पर नियोग का मिथ्या दोषारोपण प्रियांशु सेठ गुरुडम, पाखण्ड, अन्धविश्वास आदि के सागर में डूबते हुए हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने वाले, वेद-वेदाङ्गों के प्रकाण्ड विद्वान्, समाज-सुधारक एवं आर्यसमाज के प्रवर्त्तक, सत्यान्वेषी महर्षि दयानंद जी एवं उनके पुस्तक सत्यार्थप्रकाश का मनुष्यजाति हेतु योगदान अवर्णनीय एवं अविस्मरणीय है। यद्यपि आजकल बहुत से विद्वान् लोग विभिन्न मतों में हैं, जो पक्षपाती होकर वैदिक धर्म एवं सत्यार्थप्रकाश की निंदा करने में लगे रहते हैं। जिन्होंने भी सत्यार्थप्रकाश पर आक्षेप किया है, सबसे पहला आक्षेप नियोग विषय को लेकर ही किया है। परन्तु 'सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान:' अर्थात् सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य से ही विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता है। इस लेख में नियोग विषय पर लगे प्रत्येक आक्षेपों का जवाब क्रमबद्ध दिया जायेगा। नियोग: नियोग उसको कहते हैं जिस से विधवा स्त्री और जिस पुरुष की स्त्री मर गई हो वह पुरुष, ये दोनों परस्पर नियोग करके सन्तानोत्पत्ति करते हैं। प्रश्न- नियोग में क्या-क्या...